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स्थिरता को प्राथमिकता दें और स्वच्छ, हरित त्योहार मनाएं

 

भारत में ऐसे कई त्योहार मनाए जाते है जो पर्यावरण के साथ सद्भाव तथा तालमेल बनाए रखने के लिए सतत प्रथाओं की तरफदारी करते हैं। चाहे यह तरफदारी पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों के उपयोग के माध्यम से हो या बांस के पंडालों के निर्माण के माध्यम से हो

वर्ष में एक बार ऐसा समय आता है, जब वातावरण जीवंत उत्सवों से भर जाता है! गणेश चतुर्थी से लेकर दशहरा तक, दिवाली से लेकर छठ पूजा तक, ये त्योहार प्रत्येक भारतीय परिवार में बहुत महत्व रखते हैं। स्वच्छता की अवधारणा की तरह त्योहारों ने हमारे व्यवहार और जीवनशैली में परिवर्तन लाने के बारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में ऐसे कई त्योहार मनाए जाते है जो पर्यावरण के साथ सद्भाव तथा तालमेल बनाए रखने के लिए सतत प्रथाओं की तरफदारी करते हैं। चाहे यह तरफदारी पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों के उपयोग के माध्यम से हो या बांस के पंडालों के निर्माण के माध्यम से हो, शहर तीन आरआरआर - रिड्यूएस, रियूज और रीसाइक्लिंग के सिद्धांतों को अपनाने के लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। शून्य-अपशिष्ट त्योहारों के आयोजन और प्लास्टिक-मुक्त समारोहों को बढ़ावा देकर ये पहल सतत प्रक्रियाओं के प्रति उनकी मजबूत प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करती हैं। स्वच्छ हरित त्योहार पर्यावरणीय स्थिरता और जिम्मेदारी को प्राथमिकता देते हैं। इन त्योहारों का उद्देश्य कम्पोस्टिंग, रिसाइक्लिंग और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग जैसी पर्यावरण-अनुकूल प्रक्रियाओं को लागू करके कार्बन फुटप्रिंट और कचरे को कम करना है। इसके अलावा, कार्यशालाओं, प्रदर्शनियों और संवादमूलक गतिविधियों के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता और शिक्षा को भी बढ़ावा देते हैं। स्थिरता को बढ़ावा देते हुए स्वच्छ हरित उत्सव अन्य आयोजनों के लिए एक मॉडल के रूप में काम करते हैं।


जैसे-जैसे देश में दशहरा और दुर्गा पूजा आयोजन की तैयारियां जोरों पर हैं और न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी हरित आभा के बारे में विशेष जोर दिया जा रहा है। दशहरे के आयोजन में डिजिटल बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि लेजर शो के आयोजन होते हैं और दहन के पुतलों का निर्माण रिसाइकल करने योग्य कागज या प्लास्टिक से किया जा रहा है। दुर्गापूजा के पंडालों को थर्मोकोल और प्लास्टिक उत्पादों के ढेर से सजाने के स्थान पर अब आयोजकों द्वारा बांस, लकड़ी के तख्तों, नारियल के खोल, कपड़े, जूट या नारियल रस्सियों, घास/पुआल, बेंत या कागज का और दुर्गा देवी की मूर्तियां बनाने में क्ले मिट्टी जैसे विकल्पों का उपयोग किया जा रहा है। कार्यक्रमों को कचरा और एसयूपी मुक्त बनाने के लिए, अधिक भीड़ वाले क्षेत्रों में नीले और हरे रंग के कूड़ेदान रखे जा रहे हैं, रात्रिकालीन सफाई अभियान नियमित रूप से चलाए जा रहे हैं और बैनरों का निर्माण और अन्य सजावट भी गैर-प्लास्टिक वस्तुओं से की जा रही है। दिल्ली के कुछ पंडालों का निर्माण केवल बांस और कपास का उपयोग करके किया जा रहा है। मूर्ति के विसर्जन स्थलों पर पहले से ही मानव निर्मित टैंक और तालाबों का निर्माण किया गया है। पूजास्थलों से एकत्र की गई बची-खुची सामग्री जैसे फूल और अन्य उत्पादों का उपयोग बगीचे के लिए खाद बनाने में या अन्य उद्देश्यों के लिए रिसाइकिल किया जाएगा। भोजन स्टालों पर प्रसाद और खाने की वस्तुएं परोसने के लिए कागज की प्लेट, केले के पत्ते या मिट्टी की प्लेटों का उपयोग करने की व्यवस्था की गई है। नवरात्रि के दौरान, उत्तर प्रदेश ने बाजार एसोसिएशन, मूर्ति निर्माताओं, स्थानीय विक्रेताओं, मंदिर संघों/धार्मिक नेताओं और सामुदायिक समूहों के साथ मिलकर मिट्टी या किसी भी पर्यावरण अनुकूल सामग्री से ही मूर्तियों का निर्माण करने की योजना बनाई। ये मूर्तियां पानी में आसानी से घुल सकती हैं और इनसे शून्य अपशिष्ट स्वच्छोत्सव भी सुनिश्चित होता है। नवरात्रि के 8वें या 9वें दिन, उत्तर प्रदेश ने प्रसाद आदि इकट्ठा करने के लिए घाटों के किनारे मूर्तियों के लिए अर्पण स्थल और अर्पण कलश स्थापित करने की भी योजना बनाई है।

इस वर्ष महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी के उत्सव की विशेषता सतत विकल्पों में आया परिवर्तन रहा। इस वर्ष पंडालों के लिए बांस का उपयोग, गणेश की मूर्तियों के निर्माण के लिए पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी का उपयोग किया गया और  फूलों की रंगोली तथा पर्यावरण के अनुकूल मूर्ति विसर्जन के लिए मानव निर्मित विसर्जन स्थलों का भी निर्माण किया गया। हाल ही में संपन्न हुए स्वच्छता पखवाड़ा-स्वच्छता ही सेवा 2023 के हिस्से के रूप में,  इको-फ्रेंडली गणपति मूर्ति निर्माण के लिए और अपशिष्ट से सर्वश्रेष्ठ निर्माण करने के बारे में एक अंतर-स्कूल प्रतियोगिता ठाणे में आयोजित की गई थी। इस प्रतियोगिता में 22,000 से अधिक छात्रों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और उन्होंने  पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों का उपयोग करके गणपति की मूर्तियों का निर्माण किया तथा स्थिरता के बारे में जागरूकता को प्रोत्साहन दिया। 'हरित गणेश चतुर्थी' का समर्थन करने के लिए, कई प्रसिद्ध हस्तियों और लोकप्रिय कलाकारों ने भी अपने-अपने घरों में मिट्टी से भगवान गणेश की मूर्तियां बनाईं।

पनवेल एमसी ने 96 गणेश मूर्ति दान केंद्रों को उपलब्ध कराकर अपनी प्रतिबद्धता का विस्तार किया। इन केंद्रों ने स्थानीय निवासियों को पर्यावरण के प्रति जागरूक विसर्जन के लिए अपनी गणेश मूर्तियों को दान करने में सक्षम बनाया। इससे त्योहार के दौरान रीसाइक्लिंग और सतत प्रथाओं के विचार को काफी मजबूती मिली। पीएमसी का यह नवाचारी दृष्टिकोण 56 प्राकृतिक तालाबों पर विशेष रूप से डिजाइन की गई पोंटून नौकाओं को तैनात करने से सिद्ध होता है, जिससे यह विसर्जन प्रक्रिया यथासंभव पर्यावरण के अनुकूल बनाना सुनिश्चित हुआ है।


गणेश विसर्जन समारोह के समापन के बाद, मुंबई के निवासी शहर के विभिन्न स्थानों पर स्वच्छता अभियान आयोजित करने के सामूहिक प्रयास के रूप में एकजुट हुए। बॉलीवुड हस्तियों, कॉलेज के छात्रों और समर्पित स्वयंसेवकों ने जुहू बीच पर मूर्तियों के विसर्जन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए मलबे और प्रदूषण को हटाने में सक्रिय रूप से भाग लिया। मुंबई के विभिन्न स्कूलों के 500 से अधिक छात्रों सहित 900 से अधिक स्वच्छ स्वयंसेवकों ने वर्सोवा बीच की सफाई की जिम्मेदारी संभाली और 80,000 किलोग्राम कचरा साफ किया। इसके अलावा, उन्होंने प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी लगभग 7,400 गणेश मूर्तियां भी एकत्र कीं। इन मूर्तियों से समुद्र तट का वातावरण और अधिक प्रदूषित होने की संभावना थी।

इन समारोहों में प्लास्टिक के पर्यावरणीय प्रभाव को दूर करने के लिए अब  कई राज्य स्थायी समाधानों को अपना रहे हैं। इस पर्यावरण जागरूकता दृष्टिकोण के अनुरूप, असम ने परंपरा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी दोनों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए, बांस से तैयार किए गए पंडालों के साथ गणेश पूजा मनाने का निर्णय लिया। डिगबोई म्युनिसिपल बोर्ड ने प्लास्टिक मुक्त गणेश पूजा समारोह का एक उल्लेखनीय रुप से आयोजन किया। इस आयोजन में, बोर्ड ने मूर्तियों के निर्माण, प्रवेश द्वार के निर्माण और विस्तृत पारंपरिक सजावट वाली जापी हेडगियर और खोराही टोकरियां के निर्माण में बांस का मुख्य रूप से उपयोग किया। बांस के इस सरल उपयोग ने स्थिरता की भावना को साकार किया। दिल्ली के गणेश चतुर्थी समारोह में शामिल, पर्यावरण-अनुकूल गणेश मूर्तियों का वितरण किया गया। इन मूर्तियों के भीतर रोपाई वाले बीज डाले गए थे। नारियल की छाल और मिट्टी से निर्मित ये मूर्तियां पानी में घुलने के बाद इन बीजों को पौधों के रूप में विकसित होने में सहायता प्रदान करती हैं।

छठ पूजा के दौरान, पटना नगर निगम अपने प्रत्येक छठ घाट पर बिना किसी अपशिष्ट का सृजन किए ही छठ पूजा का आयोजन करता है। घाटों से पवित्र कचरा एकत्र करने के लिए कूड़ेदान लगाए गए हैं और विशेष रूप से डिजाइन किए गए वाहन तैनात किए गए हैं। एकत्रित हुए गीले कचरे को जैविक खाद में परिवर्तित किया जाता है। प्लास्टिक पर प्रतिबंध सुनिश्चित किया गया है और जीरो वेस्ट ब्रांडिंग बड़े पैमाने पर की गई है। इस शुभ अवसर पर स्वच्छ और साफ-सुथरे माहौल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, पूजा से पहले पूरे एक महीने के लिए एक व्यापक सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) अभियान चलाया जाता है।

पर्यावरण-अनुकूल त्यौहार=

जैसे-जैसे शहरी भारत एक स्थायी भविष्य की ओर बढ़ रहा है, पर्यावरण-अनुकूल त्यौहार सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण के लिए उत्प्रेरक के रूप में काम कर रहे हैं। ये उत्सव न केवल व्यवहारिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल, कचरा मुक्त, एकल-उपयोग प्लास्टिक मुक्त कार्यक्रमों और समारोहों की ओर बड़े बदलाव को भी दर्शाते हैं। यह समय पर्व स्वच्छता मनाने का है!

***एमजी/एमएस/एआरएम/आरपी/आईपीएस/एसके/ डीकेप्रविष्टि तिथि: 17 OCT 2023 by PIB Delhi(रिलीज़ आईडी: 1968462) आगंतुक पटल : 88

पर्यावरण को प्रदूषित करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही करने की प्रक्रिया भी इस वेब साईट पर प्रकाशित है

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