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भूजल संदूषण के लिए उपचारात्मक कार्य योजनाएँ


 केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) अपने भूजल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम और विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के अंतर्गत अपनी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार पूरे देश में क्षेत्रीय स्तर पर भूजल गुणवत्ता डेटा उत्पन्न करता है।, वर्ष 2024 के दौरान, भूजल गुणवत्ता हॉटस्पॉट निगरानी का कार्य सीजीडब्ल्यूबी द्वारा संदूषकों के वितरण और स्थानिक फैलाव का आकलन करने के लिए किया गया था। इस अभ्यास का उद्देश्य स्थानीय संदूषण क्षेत्रों का सीमांकन करना और आसपास के क्षेत्रों में संदूषकों के प्रसार की सीमा को समझना था।

सीजीडब्ल्यूबी ने विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों से होने वाले भूजल प्रदूषण के निवारण के लिए कई उपाय सुझाए हैं, जिनका प्रसार वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, नैक्यूम अध्ययन रिपोर्ट, राज्य/जिला प्रशासनों को जारी ऐड्वाइज़री और अपने प्रशिक्षण एवं जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से किया जाता है। सीजीडब्ल्यूबी ने आर्सेनिक और फ्लोराइड मुक्त कुओं के निर्माण की तकनीक भी विकसित की है, जिसे राज्य सरकारों के साथ साझा किया गया है ताकि वे इसे दोहरा सकें और आगे बढ़ा सकें।

भारत सरकार द्वारा राज्यों के सहयोग से वर्ष 2019 से जल जीवन मिशन का कार्यान्वयन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य देश के प्रत्येक ग्रामीण परिवार को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है। यह योजना पूरे देश को कवर करती है, न कि केवल गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्रों को। हालांकि, गुणवत्ता प्रभावित बस्तियों को पीने योग्य पानी उपलब्ध कराना जल जीवन मिशन की प्राथमिकताओं में से एक है। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को सलाह दी गई है कि वे जल गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से ग्रस्त गांवों के लिए सतही जल स्रोतों या वैकल्पिक सुरक्षित भूजल स्रोतों जैसे सुरक्षित जल स्रोतों पर आधारित पाइपयुक्त जल आपूर्ति स्कीमों की योजना बनाएं और उन्हें कार्यान्वित करें।

जल प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सरकार और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयासों के परिणामस्वरूप, आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे दो प्रमुख प्रदूषकों से प्रभावित बस्तियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। राज्यों द्वारा प्रदान की गई सूचना के अनुसार, अगस्त 2019 से जनवरी 2026 तक देश में आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित बस्तियों की संख्या क्रमशः 14,020 से घटकर 314 और 7,996 से घटकर 245 हो गई है। इन शेष बस्तियों को सामुदायिक जल शोधक संयंत्रों (सीडब्ल्यूपीपी) के माध्यम से स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया गया है।

 भूजल में नाइट्रेट की उपस्थिति आमतौर पर भूमि की सतह पर या उसके आस-पास स्थित नाइट्रोजन स्रोतों से उत्पन्न होती है, जहाँ नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट जमा होते हैं। कई मामलों में, कृषि क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों, पशु अपशिष्टों या अन्य नाइट्रोजनयुक्त अवशेषों के रिसाव के कारण नाइट्रेट की सांद्रता बढ़ जाती है।

तदनुसार, सीजीडब्ल्यूबी ने सिफारिश की है कि भूजल पुनर्भरण में वृद्धि, डाइल्यूशन प्रभाव के माध्यम से नाइट्रेट संदूषण को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, साथ ही ऊपरी मृदा परतों में नाइट्रेट उत्सर्जन को कम करने के उपाय भी आवश्यक हैं। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित अनुशंसाओं के आधार पर उर्वरकों के संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग की अवधारणा का समर्थन कर रही है। राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना के अंतर्गत, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) का उपयोग मृदा स्वास्थ्य में सुधार और उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है। सरकार (पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर) सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए विशेष रूप से जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट (एमओवीसीडीएनईआर) के माध्यम से देश में जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

यह सूचना जल शक्ति राज्यमंत्री श्री राज भूषण चौधरी द्वारा राज्यसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।

एनडी प्रविष्टि तिथि: 02 FEB 2026 by PIB Delhi(रिलीज़ आईडी: 2222165) आगंतुक पटल : 179

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