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सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने जलवायु – प्रभावित पहाड़ी सड़कों के लिए उन्नत भूस्खलन शमन उपाय अपनाए

 

पिछले साल अगस्त में उत्तरकाशी के धारली और सुखी टॉप क्षेत्रों में हुई विनाशकारी बादल फटने जैसी घटनाओं ने भारत के हिमालयी राजमार्गों के सामने विद्यमान चुनौतियों पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। इन घटनाओं में अचानक आई बाढ़, भू-भाग में अस्थिरता और जनजीवन एवं बस्तियों को भारी नुकसान शामिल है। जब से मौसम से जुड़ी उग्र घटनाओं में वृद्धि हुई है, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में महत्वपूर्ण सड़क बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए उन्नत तकनीकों का सहारा लेना शुरु कर दिया है। इन उपायों में उत्तराखंड के चार धाम मार्ग के 100 किलोमीटर लंबे हिस्से पर इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक एपर्चर रडार (इनसार) आधारित भूस्खलन निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली की तैनाती शामिल है। इससे अधिकारियों को आपदा आने से पहले सूक्ष्म भू-हलचल का पता लगाने और संवेदनशील ढलानों की पहचान करने में मदद मिलेगी।

इस प्रयास के पूरक के रूप में, हिमाचल प्रदेश में एनएच-5 के परवानू-सोलन खंड पर भूस्खलन, भूमि धंसने, भूजल प्रवाह और चट्टान गिरने की आशंका वाले क्षेत्रों की वास्तविक समय में निगरानी करने के लिए एक उन्नत चेतावनी और अलर्ट प्रणाली की योजना बनाई जा रही है। मंत्रालय की ये पहलें आपदाओं के घटित होने के बाद प्रतिक्रिया देने से हटकर उनकी भविष्यवाणी और रोकथाम की ओर एक व्यापक बदलाव को दर्शाती है। इससे भारत के पहाड़ी राज्यों में एक सुरक्षित और अधिक लचीला राजमार्ग नेटवर्क बनाने में मदद मिलेगी।

भूवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गतिशील राजमार्गों के निर्माण के लिए न केवल इंजीनियरिंग विशेषज्ञता बल्कि भूभाग की गहरी समझ भी आवश्यक है। कई पहलों में से एक के रूप में, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वैज्ञानिक एजेंसियों के साथ संस्थागत सहयोग को सुदृढ़ किया है, जिसमें सुरंग परियोजनाओं की भूवैज्ञानिक जांच और भू-खतरों के अध्ययन के लिए डेटा साझा करने हेतु भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करना शामिल है। सड़क सुरंगों की सुरक्षा और संरचनात्मक अखंडता को बढ़ाने के लिए, जीएसआई द्वारा तैयार किए गए भूवैज्ञानिक मानचित्रों और राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण को अब कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के नियोजन और संयोजन सर्वेक्षण चरणों में एकीकृत किया जा रहा है।

भारत का कुल राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क लगभग 1,46,570 किलोमीटर का है, जिसमें से लगभग 16,788 किलोमीटर हिस्सा पहाड़ी राज्यों में स्थित है। ऐसे में सुरक्षित, विश्वसनीय और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित बुनियादी ढांचा तैयार करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। हिमालय क्षेत्र, जो विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, भूस्खलन, चट्टान गिरने, अचानक बाढ़, बादल फटने और अन्य भू-आपदाओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।

राजमार्ग निर्माण कार्यप्रणालियों का सुदृढ़ीकरण

पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क परियोजनाओं की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, सड़क और परिवहन मंत्रालय ने कई नीतिगत सुधार किए हैं। अब चरणबद्ध निर्माण पद्धति अपनाई जा रही है, जिसके तहत निर्माण कार्य कई चरणों में होगा। शुरुआती लगभग एक वर्ष की अवधि पूरी तरह से पहाड़ी ढलानों की कटाई और उन्हें स्थिर करने के लिए सुरक्षा कार्यों को पूरा करने के लिए समर्पित होगी। सड़क निर्माण तभी शुरू होगा जब ढलानें कम से कम एक मानसून के मौसम तक स्थिर साबित हो जाएंगी।

भू-स्थानिक जानकारी का उपयोग करके सटीक निर्णय लेने के लिए, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने उन्नत उपग्रह-आधारित निगरानी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाली कंपनियों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। ये प्रौद्योगिकियां भूस्खलन और ढलान गिरने से बहुत पहले ही सूक्ष्म भू-हलचलों का पता लगा लेती हैं। उपग्रह डेटा के आवधिक और निरंतर विश्लेषण के माध्यम से, उनकी प्रौद्योगिकी प्रारंभिक चेतावनी संकेतक प्रदान करने, लक्षित शमन उपायों का समर्थन करने और रखरखाव योजना में सुधार करने में मदद करती है। इसी के अंतर्गत, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय उत्तराखंड में चार धाम मार्ग पर भूस्खलन की निगरानी के लिए आईएनएसएआर तकनीक का परीक्षण कर रहा है।

यह पहल इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्वतीय राजमार्गों के निर्माण में आमतौर पर 15-30 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर की लागत आती है। एक मध्यम भूस्खलन से मरम्मत की लागत 10-25 करोड़ रुपये तक हो सकती है और यातायात 2-5 दिनों तक बाधित हो सकता है। समय पर कदम उठाने की सुविधा प्रदान करके और व्यापक स्तर पर पत्थरों के गिरने की संभावना को कम करने के माध्यम से, उपग्रह-आधारित निगरानी में रखरखाव लागत को कम करने, व्यवधानों को न्यूनतम करने और देश के भूस्खलन-प्रवण पहाड़ी राज्यों में राष्ट्रीय राजमार्गों की मजबूती, सुरक्षा और विश्वसनीयता को बढ़ाने की क्षमता है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने मानक निर्माण अवधि पर एक नीति भी लागू की है, जो हिमालय, उत्तर-पूर्व, पश्चिमी घाट और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जैसे क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त समय प्रदान करती है।

उचित ढलान स्थिरीकरण और रखरखाव गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिए पर्याप्त भूमि का प्रावधान करते हुए अतिरिक्त मार्ग का अधिकार भी प्रदान किया जा रहा है।

 

कार्यनीतिक साझेदारियों के माध्यम से गतिशीलता निर्माण

यह महसूस करते हुए कि लचीले बुनियादी ढांचे के लिए बहुविषयक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, रक्षा भू-सूचना अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय रॉक मैकेनिक्स संस्थान और आईआईटी रुड़की सहित प्रमुख संस्थानों के साथ सहयोग को मजबूत किया है। ये साझेदारियां भू-तकनीकी जांच, डिजाइन समीक्षा, सुरक्षा ऑडिट, क्षमता निर्माण और नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियों के कार्यान्वयन में सहायक होंगी। प्रत्येक सहयोग भारत को पर्वतीय अवसंरचना के विकास में वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के निकट लाता है।

भूस्खलन शमन और भू-खतरा प्रबंधन की दिशा में प्रयासों को मजबूत करने के लिए, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में विशेष भूस्खलन शमन कार्य आरंभ करने के लिए टिहरी जल विकास निगम इंडिया लिमिटेड के साथ एक समझौता किया है। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ भू-खतरों के आकलन और शमन के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और वैज्ञानिक सहायता प्रदान करने हेतु रक्षा भू-सूचना अनुसंधान संस्थान के साथ साझेदारी की है।

ढलान विशिष्ट शमन उपायों की दिशा में प्रयास

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने ढलान स्थिरीकरण के लिए एक वैज्ञानिक, स्थल-विशिष्ट दृष्टिकोण भी अपनाया है। आईआईटी दिल्ली के नेतृत्व वाली एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई रूपरेखा रिपोर्ट के आधार पर, इंजीनियर अब उपयुक्त शमन उपायों का चयन करने से पहले वर्षा के पैटर्न, भूजल की स्थिति और भूवैज्ञानिक विशेषताओं के आधार पर प्रत्येक ढलान का आकलन करते हैं। चूंकि प्रत्येक ढलान का व्यवहार अलग-अलग होता है, इसलिए समाधानों को विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता होती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि ढलान चट्टान, मिट्टी, मलबा या ढीली ढलान सामग्री से बना है या नहीं। ड्रोन, एलआईडीएआर (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) सर्वेक्षण और डिजिटल टेरेन मॉडल जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग विस्तृत जांच करने और जोखिमों को बड़े खतरों में परिवर्तित होने से पहले पहचानने के लिए किया जा रहा है।

इन आकलनों के आधार पर, कमज़ोर ढलानों को सुदृढ़ करने के लिए इंजीनियरिंग और प्रकृति-आधारित समाधानों की एक विस्तृत श्रृंखला को लागू किया जा रहा है। मिट्टी की कीलें लगाना, हाई-टैंसाइल स्टील के तार की जाली, प्रीस्ट्रेस्ड केबल एंकर, रिटेनिंग दीवारें और कुशल जल निकासी प्रणाली जैसे उपाय ढलान के ढहने और चट्टानों के गिरने को रोकने में सहायक होते हैं। अब जल निकासी प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है, क्योंकि अनियंत्रित जल रिसाव ढलान की अस्थिरता के प्राथमिक कारणों में से एक है। उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में किए गए स्थिरीकरण कार्यों जैसे सफल कार्यान्वयन यह दर्शाते हैं कि सीढ़ीदार खेत, जल निकासी प्रणाली, हाइड्रोसीडिंग, रॉक एंकर और रिटेनिंग संरचनाओं का संयोजन ढलान की स्थिरता को किस प्रकार उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है।

आईआईटी की रिपोर्ट मेघालय में बांस की बेंचिंग और वेटिवर घास के वृक्षारोपण जैसे टिकाऊ समाधानों पर भी प्रकाश डालती है। ये प्रदर्शित करते हैं कि स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री ढलान संरक्षण के लिए प्रभावी और किफायती सुरक्षा कैसे प्रदान कर सकती है। नियमित निगरानी और रखरखाव के साथ, ये उपाय सुरक्षित और अधिक गतिशील पहाड़ी सड़कों के निर्माण में सहायक हो रहे हैं।

चट्टान गिरने से बचाव के मानकों को आगे बढ़ाना

राष्ट्रीय राजमार्गों पर चट्टान गिरने से बचाव के उपायों की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप एक व्यापक विनिर्देश ढांचा विकसित किया है। मंत्रालय ने ऐसे मानक प्रस्तावित किए हैं जो चट्टान गिरने से बचाव उत्पादों के लिए यूरोपीय तकनीकी मूल्यांकन प्रमाणन और सीई मार्किंग सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन को अनिवार्य बनाते हैं। यह ढांचा उत्पाद की गुणवत्ता से आगे बढ़कर कठोर सत्यापन तंत्रों को शामिल करता है, जैसे सामग्री की मात्रा की अनुरूपता जांच, बारकोड-आधारित ट्रेसबिलिटी, निर्माता परीक्षण आवश्यकताएं, स्थापित प्रणालियों का क्षेत्र सत्यापन और एंकर तथा चट्टान गिरने से बचाव के जालों का प्रूफ-टेस्ट। यह वारंटी प्रावधानों, स्थायित्व मानकों, स्थापना के बाद संचालन और रखरखाव आवश्यकताओं के लिए आपूर्तिकर्ता की भागीदारी के माध्यम से दीर्घकालिक प्रदर्शन पर भी ध्यान देता है।

कार्यान्वयन में तेजी

पहाड़ी क्षेत्रों में मजबूत अवसंरचना के प्रति प्रतिबद्धता के परिणाम दिखने लगे हैं। उदाहरण के लिए, अकेले उत्तराखंड में ही भूस्खलन की आशंका वाले 58 स्थानों पर उपचार कार्य किया जा चुका है, 96 स्थलों पर वर्तमान में राहत कार्य चल रहा है, जबकि 104 अन्य स्थानों पर जोखिम रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और जांच का काम जारी है।पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें केवल परिवहन का साधन नहीं हैं, बल्कि समुदायों को आवश्यक सेवाओं और आजीविका के अवसरों से जोड़ने वाली जीवन रेखा भी हैं। राजमार्ग बुनियादी ढांचे के विकास में वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन को शामिल करके, ये नए उपाय भारत के विविध और अक्सर संवेदनशील भूभागों की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम सुरक्षित और अधिक गतिशील परिवहन गलियारे बनाने में मदद करेंगे

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